वाल्मीकि रामायण 5.14.20
महा लतानाम् दामानि व्यधमत् तरसा कपिः ।यथा प्रावृषि विन्ध्यस्य मेघ जालानि मारुतः॥
mahā latānām dāmāni vyadhamat tarasā kapiḥ |yathā prāvṛṣi vindhyasya megha jālāni mārutaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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