वाल्मीकि रामायण 5.18.13
काचिद्रत्नमयीं स्थालीं पूर्णां पानस्य ब्राजतम् ।दक्षिणा दक्षिणेनैव तदा जग्राह पाणिना॥
kācidratnamayīṃ sthālīṃ pūrṇāṃ pānasya brājatam |dakṣiṇā dakṣiṇenaiva tadā jagrāha pāṇinā ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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