वाल्मीकि रामायण 5.18.9
नानामृगगणाकीर्णां फलैः प्रपतितैर्वृताम् ।अशोकवनकामेव प्राविशत्संततद्रुमाम्॥
nānāmṛgagaṇākīrṇāṃ phalaiḥ prapatitairvṛtām |aśokavanakāmeva prāviśatsaṃtatadrumām ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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