वाल्मीकि रामायण 5.2.27
आगत्यापीह हरयो भविष्यन्ति निररथकाः ।न हि युद्धेन व लङ्का शक्या जेतुं सुरैरपि॥
āgatyāpīha harayo bhaviṣyanti nirarathakāḥ |na hi yuddhena va laṅkā śakyā jetuṃ surairapi ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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