वाल्मीकि रामायण 5.2.55
अचिन्त्यामद्भुताकारां दृष्ट्वा लङ्कां महाकपिः ।आसीद्विष्ण्डो हृष्टश्च वैदेह्या दर्शनोत्सुकः॥
acintyāmadbhutākārāṃ dṛṣṭvā laṅkāṃ mahākapiḥ |āsīdviṣṇḍo hṛṣṭaśca vaidehyā darśanotsukaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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