वाल्मीकि रामायण 5.24.2
उन्मत्तेव प्रमत्तेव भ्रान्तचित्तेव शोचती ।उपावृत्ता किशोरीव विवेष्टन्ती महीतले॥
unmatteva pramatteva bhrāntacitteva śocatī |upāvṛttā kiśorīva viveṣṭantī mahītale ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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