वाल्मीकि रामायण 5.27.15
भर्तुरङ्कात् समुत्पत्य ततः कमललोचना ।चन्द्रसूर्यो मया दृष्टा पाणिना परिमार्जती॥
bharturaṅkāt samutpatya tataḥ kamalalocanā |candrasūryo mayā dṛṣṭā pāṇinā parimārjatī ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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