वाल्मीकि रामायण 5.27.2
ततः सीतामुपागम्य राक्षस्यो घोरदर्शनाः ।पुनः परुषमेकार्थमनर्थार्थमथाब्रुवन्॥
tataḥ sītāmupāgamya rākṣasyo ghoradarśanāḥ |punaḥ paruṣamekārthamanarthārthamathābruvan ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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