वाल्मीकि रामायण 5.30.19
अवश्यमेव वक्तव्यं मानुषं वाक्यमर्थवत् ।मया सान्त्वयितुं शक्या नान्यथेयमनिन्दिता॥
avaśyameva vaktavyaṃ mānuṣaṃ vākyamarthavat |mayā sāntvayituṃ śakyā nānyatheyamaninditā ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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