वाल्मीकि रामायण 5.33.27
स विहायोत्तरीयाणि महार्हाणि महायशाः ।विसृज्य मनसा राज्यं जनन्यै मां समादिशत्॥
sa vihāyottarīyāṇi mahārhāṇi mahāyaśāḥ |visṛjya manasā rājyaṃ jananyai māṃ samādiśat ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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