वाल्मीकि रामायण 5.34.10
अहो धिग् दुष्कृतमिदं कथितं हि यदस्य मे ।रूपान्तरमुपागम्य स एवायं हि रावणः॥
aho dhig duṣkṛtamidaṃ kathitaṃ hi yadasya me |rūpāntaramupāgamya sa evāyaṃ hi rāvaṇaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें