वाल्मीकि रामायण 5.34.20
अहो स्वप्नस्य सुखता या ऽहमेंव चिराहृता ।प्रेषितं नाम पश्यामि राघवेण वनौकसम्॥
aho svapnasya sukhatā yā 'hameṃva cirāhṛtā |preṣitaṃ nāma paśyāmi rāghaveṇa vanaukasam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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