वाल्मीकि रामायण 5.34.32
अपकृष्याश्रमपदान्मृगरूपेण राघवम् ।शून्ये येनापनीता ऽसि तस्य द्क्ष्यसि यत्फलम्॥
apakṛṣyāśramapadānmṛgarūpeṇa rāghavam |śūnye yenāpanītā 'si tasya dkṣyasi yatphalam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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