वाल्मीकि रामायण 5.34.39
अहं सुग्रीवसचिवो हनुमान्नाम वानरः ।प्रविष्टो नगरीं लङ्कां लङ्घयित्वा महोदधिम्॥
ahaṃ sugrīvasacivo hanumānnāma vānaraḥ |praviṣṭo nagarīṃ laṅkāṃ laṅghayitvā mahodadhim ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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