वाल्मीकि रामायण 5.36.7
विक्रान्तस्त्वं समर्थस्त्वं प्राज्ञस्त्वं वानरोत्तम ।येनेदं राक्षसपदं त्वयैकेन प्रधर्षितम्॥
vikrāntastvaṃ samarthastvaṃ prājñastvaṃ vānarottama |yenedaṃ rākṣasapadaṃ tvayaikena pradharṣitam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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