वाल्मीकि रामायण 5.37.18
कृत्वैव तु वयो मह्यं क्षिप्रमेष्यति राघवः ।चमूं प्रकर्षन् महतीं हर्यृक्षगणसङ्कुलाम्॥
kṛtvaiva tu vayo mahyaṃ kṣiprameṣyati rāghavaḥ |camūṃ prakarṣan mahatīṃ haryṛkṣagaṇasaṅkulām ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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