वाल्मीकि रामायण 5.37.3
ऐश्वर्ये वा सुविस्तीर्णे व्यसने वा सुदारुणे ।रज्ज्वेव पुरुषं बद्ध्वा कृतान्तः परिकर्षति॥
aiśvarye vā suvistīrṇe vyasane vā sudāruṇe |rajjveva puruṣaṃ baddhvā kṛtāntaḥ parikarṣati ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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