वाल्मीकि रामायण 5.37.7
स वाच्यः सन्त्वरस्वेति यावदेव न पूर्यते ।अयं संवत्सरः कालस्तावद्धि मम जीवितम्॥
sa vācyaḥ santvarasveti yāvadeva na pūryate |ayaṃ saṃvatsaraḥ kālastāvaddhi mama jīvitam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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