वाल्मीकि रामायण 5.38.32
अनुसृप्तस्तदा काको जगाम विविधां गतिम् ।लोककाम इमं लोकं सर्वं वै विचचार ह॥
anusṛptastadā kāko jagāma vividhāṃ gatim |lokakāma imaṃ lokaṃ sarvaṃ vai vicacāra ha ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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