वाल्मीकि रामायण 5.38.58
पितरं मातरं चैव संमान्याभिप्रसाद्य च ।अनुप्रव्रजितो रामं सुमित्रा येन सुप्रजाः॥
pitaraṃ mātaraṃ caiva saṃmānyābhiprasādya ca |anupravrajito rāmaṃ sumitrā yena suprajāḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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