वाल्मीकि रामायण 5.38.7
कारणैर्बहुभिर्देवि रामप्रियचिकीर्षया ।स्नेहप्रस्कन्नमनसा मयैतत् समुदीरितम्॥
kāraṇairbahubhirdevi rāmapriyacikīrṣayā |snehapraskannamanasā mayaitat samudīritam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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