वाल्मीकि रामायण 5.38.70
प्रतिगृह्य ततो वीरो मणिरत्नमनुत्तमम् ।अङ्गुल्या योजयामास न ह्यस्य प्राभवद्भुजः॥
pratigṛhya tato vīro maṇiratnamanuttamam |aṅgulyā yojayāmāsa na hyasya prābhavadbhujaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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