वाल्मीकि रामायण 5.39.15
नहि पश्यामि मर्त्येषु नासुरेषु सुरेषु वा ।यस्तस्य क्षिपतो बाणान् स्थातुमुत्सहतो ऽग्रतः॥
nahi paśyāmi martyeṣu nāsureṣu sureṣu vā |yastasya kṣipato bāṇān sthātumutsahato 'grataḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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