वाल्मीकि रामायण 5.39.47
एवमाश्वास्य वैदेहीं हनुमान् मारुतात्मजः ।गमनाय मतिं कृत्वा वैदेहीं पुनरब्रवीत्॥
evamāśvāsya vaidehīṃ hanumān mārutātmajaḥ |gamanāya matiṃ kṛtvā vaidehīṃ punarabravīt ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें