वाल्मीकि रामायण 5.39.51
स तु मर्मणि घोरेण ताडितो मन्मथेषुणा ।न शर्म लभते रामः सिंहार्दित इव द्विपः॥
sa tu marmaṇi ghoreṇa tāḍito manmatheṣuṇā |na śarma labhate rāmaḥ siṃhārdita iva dvipaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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