वाल्मीकि रामायण 5.4.2
अद्वारेण मःआतेजा हौमान् कपिसत्तमः ।प्रविश्य नगरीम् लङ्काम् कपिराजहितम्करः॥
advāreṇa maḥātejā haumān kapisattamaḥ |praviśya nagarīm laṅkām kapirājahitamkaraḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें