वाल्मीकि रामायण 5.46.15
ते स्वामिवचनं सर्वे प्रतिगृह्य महौजसः ।समुत्पेतुर्महावेगा हुताशसमतेजसः॥
te svāmivacanaṃ sarve pratigṛhya mahaujasaḥ |samutpeturmahāvegā hutāśasamatejasaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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