वाल्मीकि रामायण 5.46.18
तोरणस्थं महोत्साहं महासत्त्वं महाबलम् ।महामतिं महावेगं महाकायं महाबलम्॥
toraṇasthaṃ mahotsāhaṃ mahāsattvaṃ mahābalam |mahāmatiṃ mahāvegaṃ mahākāyaṃ mahābalam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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