वाल्मीकि रामायण 5.46.25
स दूरं सहसोत्पत्य दुर्धरस्य रथे हरिः ।निपपात महवेगो विद्युद्राशिर्गिराविव॥
sa dūraṃ sahasotpatya durdharasya rathe hariḥ |nipapāta mahavego vidyudrāśirgirāviva ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें