वाल्मीकि रामायण 5.47.29
न खल्वयं नाभिभवेदुपेक्षितः पराक्रमो ह्यस्य रणे विवर्धते ।प्रमापणं त्वेव ममास्य रोचते न वर्धमानो ऽग्निरुपेक्षितुं क्षमः॥
na khalvayaṃ nābhibhavedupekṣitaḥ parākramo hyasya raṇe vivardhate |pramāpaṇaṃ tveva mamāsya rocate na vardhamāno 'gnirupekṣituṃ kṣamaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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