वाल्मीकि रामायण 5.48.31
शराणामन्तरेष्वाशु व्यवर्तत महाकपिः ।हरिस्तस्याभिलक्ष्यस्य मोघयँल्लक्ष्यसंग्रहम्॥
śarāṇāmantareṣvāśu vyavartata mahākapiḥ |haristasyābhilakṣyasya moghayam̐llakṣyasaṃgraham ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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