वाल्मीकि रामायण 5.48.45
ग्रहणे चापि रक्षोभिर्महान् मे गुणदर्शनः ।राक्षसेन्द्रेण संवादस्तस्मादगृह्णन्तु मां परे॥
grahaṇe cāpi rakṣobhirmahān me guṇadarśanaḥ |rākṣasendreṇa saṃvādastasmādagṛhṇantu māṃ pare ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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