वाल्मीकि रामायण 5.48.54
अथेन्द्रजित्तं प्रसमीक्ष्य मुक्तमस्त्रेण बद्धं द्रुमचीरसूत्रैः ।व्यदर्शयत्तत्र महाबलं हरिप्रवीरं सगणाय राज्ञे॥
athendrajittaṃ prasamīkṣya muktamastreṇa baddhaṃ drumacīrasūtraiḥ |vyadarśayattatra mahābalaṃ haripravīraṃ sagaṇāya rājñe ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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