वाल्मीकि रामायण 5.49.12
सुखोपविष्टं रक्षोभिश्चतुर्भिर्बलदर्पितैः ।कृत्स्न परिवृतं लोकं चतुर्भिरिव सागरैः॥
sukhopaviṣṭaṃ rakṣobhiścaturbhirbaladarpitaiḥ |kṛtsna parivṛtaṃ lokaṃ caturbhiriva sāgaraiḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें