वाल्मीकि रामायण 5.49.17
अहो रूपमहो धैर्यमहो सत्त्वमहो द्युतिः ।अहो राक्षसराजस्य सर्वलक्षणयुक्तता॥
aho rūpamaho dhairyamaho sattvamaho dyutiḥ |aho rākṣasarājasya sarvalakṣaṇayuktatā ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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