वाल्मीकि रामायण 5.49.4
महार्हक्षौमसंवीतं रक्तचन्दनरूषितम् ।स्वनुलिप्तं विचित्राभिर्विविधाभिश्च भक्तिभिः॥
mahārhakṣaumasaṃvītaṃ raktacandanarūṣitam |svanuliptaṃ vicitrābhirvividhābhiśca bhaktibhiḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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