वाल्मीकि रामायण 5.53.13
सर्वेषामेव पर्याप्तो राक्षसानामहं युधि ।किं तु रामस्य प्रीत्यर्थं विषहिष्ये ऽहमीदृशम्॥
sarveṣāmeva paryāpto rākṣasānāmahaṃ yudhi |kiṃ tu rāmasya prītyarthaṃ viṣahiṣye 'hamīdṛśam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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