वाल्मीकि रामायण 5.53.43
विमुक्तश्चाभवच्छ्रीमान् पुनः पर्वतसन्निभः ।वीक्षमाणश्च ददृशे परिघं तोरणाश्रितम्॥
vimuktaścābhavacchrīmān punaḥ parvatasannibhaḥ |vīkṣamāṇaśca dadṛśe parighaṃ toraṇāśritam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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