वाल्मीकि रामायण 5.54.15
यज्ञशत्रोश्च भवनं ब्रह्मशत्रोस्तथैव च ।नरान्तकस्य कुम्भस्य निकुम्भस्य दुरात्मनः॥
yajñaśatrośca bhavanaṃ brahmaśatrostathaiva ca |narāntakasya kumbhasya nikumbhasya durātmanaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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