वाल्मीकि रामायण 5.54.22
प्रदीप्तमग्निं पवनस्तेषु वेश्मस्वचारयत् ।अभूच्छ्वसनसंयोगादतिवेगो हुताशनः॥
pradīptamagniṃ pavanasteṣu veśmasvacārayat |abhūcchvasanasaṃyogādativego hutāśanaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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