वाल्मीकि रामायण 5.54.38
।किं वैष्णवं वा कपिरूपमेत्य रक्षोविनाशाय परं सुतेजः ।अनन्तमव्यक्तमचिन्त्यमेकं स्वमायया साम्प्रतमागतं वा॥
|kiṃ vaiṣṇavaṃ vā kapirūpametya rakṣovināśāya paraṃ sutejaḥ |anantamavyaktamacintyamekaṃ svamāyayā sāmpratamāgataṃ vā ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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