वाल्मीकि रामायण 5.54.48
भङ्क्त्वा वनं महातेजा हत्वा रक्षांसि संयुगे ।दग्ध्वा लङ्कापुरीं रम्यां रराज स महाकपिः॥
bhaṅktvā vanaṃ mahātejā hatvā rakṣāṃsi saṃyuge |dagdhvā laṅkāpurīṃ ramyāṃ rarāja sa mahākapiḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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