वाल्मीकि रामायण 5.54.5
यो ह्ययं मम लांगूले दीप्यते हव्यवाहनः ।अस्य सन्तर्पणं न्याय्यं कर्तुमेभिर्गृहोत्तमैः॥
yo hyayaṃ mama lāṃgūle dīpyate havyavāhanaḥ |asya santarpaṇaṃ nyāyyaṃ kartumebhirgṛhottamaiḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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