वाल्मीकि रामायण 5.55.19
एतदेव वचः श्रुत्वा भरतो भ्रातृवत्सलः ।धर्मात्मा सहशत्रुघ्नः कथं शक्ष्यति जीवितुम्॥
etadeva vacaḥ śrutvā bharato bhrātṛvatsalaḥ |dharmātmā sahaśatrughnaḥ kathaṃ śakṣyati jīvitum ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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