वाल्मीकि रामायण 5.55.32
प्रपलायितरक्षः स्त्रीबालवृद्धसमाकुला ।जनकोलाहलाध्माता क्रन्दन्तीवाद्रिकन्दरे॥
prapalāyitarakṣaḥ strībālavṛddhasamākulā |janakolāhalādhmātā krandantīvādrikandare ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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