वाल्मीकि रामायण 5.55.7
यः समुत्पतितं क्रोधं क्षमयैव निरस्यति ।यथोरगस्त्वचं जीर्णां स वै पुरुष उच्यते॥
yaḥ samutpatitaṃ krodhaṃ kṣamayaiva nirasyati |yathoragastvacaṃ jīrṇāṃ sa vai puruṣa ucyate ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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