वाल्मीकि रामायण 5.57.23
जाम्बवान् स हरिश्रेष्ठः प्रीतिसंहृष्टमानसः ।उपामन्त्र्य हरीन् सर्वानिदं वचनमब्रवीत्॥
jāmbavān sa hariśreṣṭhaḥ prītisaṃhṛṣṭamānasaḥ |upāmantrya harīn sarvānidaṃ vacanamabravīt ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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