वाल्मीकि रामायण 5.57.50
तस्थौ तत्राङ्गदः श्रीमान् वानरैर्बहुभिर्वृतः ।उपास्यमानो विबुधैर्दिवि देवपतिर्यथा॥
tasthau tatrāṅgadaḥ śrīmān vānarairbahubhirvṛtaḥ |upāsyamāno vibudhairdivi devapatiryathā ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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