वाल्मीकि रामायण 5.58.108
ततो ऽवर्धत मे कायस्तदा पर्वतसन्निभः ।युद्धकाङ्क्षी वनं तच्च विनाशयितुमारभे॥
tato 'vardhata me kāyastadā parvatasannibhaḥ |yuddhakāṅkṣī vanaṃ tacca vināśayitumārabhe ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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