वाल्मीकि रामायण 5.58.109
तद्भग्नं वनषण्डं तु भ्रान्तत्रस्तमृगद्विजम् ।प्रतिबुद्धा निरीक्षन्ते राक्षस्यो विकृताननाः॥
tadbhagnaṃ vanaṣaṇḍaṃ tu bhrāntatrastamṛgadvijam |pratibuddhā nirīkṣante rākṣasyo vikṛtānanāḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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